काबुली चने के बाजार से क्या मिल रही है रिपोर्ट

काबुली चने के बाजार से क्या मिल रही है रिपोर्ट
काबुली चने के बाजार से क्या मिल रही है रिपोर्ट

काबुली चने के बाजार से क्या मिल रही है रिपोर्ट

साथियों, काबुली चना का बाजार आजकल किसी थकी हुई नदी की तरह लग रहा है – धीमा, सुस्त और कमजोर। बीते हफ्ते ही इसकी कीमतों में 200 रुपये की गोता लग गया, और शनिवार को इंदौर मंडी में 42/44 कंटेनर वाले काबुली के दाम 10,200 रुपये क्विंटल पर ठहर गए। एवरेज क्वालिटी का चना इंदौर में 8,500, देवास में 8,700, उज्जैन में फिर 8,500 और रतलाम में 9,000 रुपये पर बिका। ये भाव इतने नीचे आ चुके हैं कि लगता है बाजार अपनी गहराई छू रहा है, लेकिन यहां भी खरीदारों की भौंहें तनी हुई हैं। न घरेलू मांग में जान है, न एक्सपोर्ट से कोई मजबूत सहारा।

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मैंने खुद इंदौर की मंडी का चक्कर लगाया है कुछ दिन पहले। वहां व्यापारी भाइयों से बात की तो सबका यही कहना था – “भाई, स्टॉक तो भरा पड़ा है, लेकिन कोई लेने वाला ही नहीं।” काबुली चना के ये निचले स्तर पर पहुंचने के बावजूद खरीदारी ठंडी क्यों? कारण साफ है – भारी कैरी फॉरवर्ड स्टॉक। सिर्फ मध्य प्रदेश में ही 5-6 लाख बोरी पुराना माल गोदामों में सड़ रहा है। महाराष्ट्र और गुजरात के बाजारों में भी ढेर सारा पुराना स्टॉक पड़ा है। ये सब मिलकर बाजार पर भारी बोझ बन गया है। व्यापारी सोच रहे हैं, “नया माल आएगा तो ये पुराना कौन लेगा?”

लेकिन उम्मीद की एक पतली सी धूप की किरण तो है – रमजान। 2026 में रमजान फरवरी के मध्य से शुरू होने की संभावना है, लगभग 17-18 फरवरी से। परंपरागत रूप से इस दौरान घरेलू मांग जनवरी अंत या फरवरी शुरुआत में जोर पकड़ती है। खासकर चने की खपत इफ्तार और रोजों में बढ़ जाती है। अगर ये मांग समय पर मजबूत हुई, तो 200-400 रुपये का अस्थायी उछाल आ सकता है। मैंने कुछ पुराने व्यापारियों से पूछा, तो बोले, “हां भाई, रमजान में थोड़ी हलचल तो होती ही है, लेकिन ये स्थायी नहीं।” फिर भी, ये छोटी सी उम्मीद किसानों को थोड़ा संबल दे रही है।

अब सप्लाई की तरफ नजर डालें तो नया सीजन चिंता बढ़ा रहा है। महाराष्ट्र और गुजरात में काबुली चने का रकबा बढ़ने के मजबूत संकेत हैं। खासकर जलगांव जैसे इलाकों में कपास से झुलस चुके किसान अब काबुली डॉलर चना की ओर रुख कर रहे हैं। कपास उखाड़कर चना बो दिया। मध्य प्रदेश में रकबा पिछले साल जितना ही है, और फसल की हालत अब तक ठीक लग रही है। किसानों का झुकाव भी काबुली की तरफ ज्यादा है, क्योंकि डॉलर चना की कीमतें देसी से बेहतर रहती हैं। हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि पूसा चना 4035 जैसी नई किस्में मध्य भारत – एमपी, महाराष्ट्र, गुजरात – के लिए खासतौर पर फिट हैं। ये 115 दिन में पक जाती हैं और एक्सपोर्ट क्वालिटी के बड़े दाने देती हैं। अगर बुवाई बढ़ी, तो नया माल आने पर पुराने स्टॉक का दबाव और तेज होगा।

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ऑल ओवर लुक? कमजोर डिमांड, ढेर सारा कैरी स्टॉक और बढ़ती बुवाई – ये तिकड़ी बाजार को नीचे खींच रही है। मंडी मीडिया का आकलन है कि अगर एक्सपोर्ट में इजाफा नहीं हुआ, तो 200-300 रुपये और गिरावट हो सकती है। निर्यात अभी सुस्त है, चीन-सऊदी जैसे देशों से पहले जैसी मांग नहीं। घरेलू मिलर भी सतर्क हैं। लेकिन रमजान अगर सपोर्ट कर गया, तो सीमित सुधार संभव। वैसे, हाल की मंडी भाव लिस्ट्स देखें तो दिसंबर 2025 में औसत 8,600-9,000 के आसपास ही घूम रहा है, जो पिछले महीनों से नीचे है।

किसानों से बात की तो उनका दर्द साफ झलकता है। एक देवास वाले भाई बोले, “पुराना स्टॉक बिके बिना नया कैसे लाऊं? लागत ही निकल नहीं रही।” व्यापारियों का मानना है कि सरकार अगर एक्सपोर्ट को बूस्ट दे या स्टॉक लिमिट लगाए, तो राहत मिले। लेकिन फिलहाल बाजार इसी कमजोर रुझान के साथ लंगड़ा रहा।

साथियों, ये बाजार का खेल है – कभी ऊंचा, कभी नीचा। मैं तो कहता हूं, जो कैश हो उसके लिए ये निचले भाव खरीदारी का मौका हो सकते हैं, लेकिन रिस्क अपना-अपना। किसान भाइयों, अपनी फसल की ग्रेडिंग पर ध्यान दें, अच्छा माल हमेशा बेहतर दाम लाता है। व्यापार अपने विवेक से करें, आंकड़ों पर न भरोसा, बाजार की नब्ज पर। कोई सवाल हो तो पूछ लें। जय जवान, जय किसान!

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