बासमती की वैश्विक पहचान की जंग: EU में PGI टैग का फैसला नजदीक, भारत को मिल सकती है बढ़त

बासमती की वैश्विक पहचान की जंग
बासमती की वैश्विक पहचान की जंग

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर चावल डंपिंग के आरोपों ने बासमती के बाजार को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। ऐसे में यूरोपीय यूनियन में बासमती चावल के लिए Protected Geographical Indication (PGI) टैग की प्रक्रिया अब अपने आखिरी दौर में पहुंच चुकी है। भारत और पाकिस्तान दोनों ने इस प्रतिष्ठित टैग के लिए अलग-अलग आवेदन दिए हैं, और फैसला भारत के निर्यात और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग पर बड़ा असर डाल सकता है।

मुझे लगता है कि अगर भारत को यह टैग मिल गया, तो EU के बाजार में लंबे दाने वाला सुगंधित बासमती सिर्फ भारतीय मूल का ही बेचा जा सकेगा। इससे हमारे निर्यातकों को विशेष अधिकार मिलेंगे और कीमतों में भी प्रीमियम लग सकेगा। भारत ने यह आवेदन जुलाई 2018 में दिया था, जिसे EU ने 2020 में आधिकारिक रूप से नोटिफाई किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान का आवेदन बाद में आया, लेकिन इटली सहित कुछ सदस्य देशों ने उस पर बाल मजदूरी, गैरकानूनी कीटनाशकों और डंपिंग जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए विरोध जताया है। EU ने इन आपत्तियों को स्वीकार किया है, जिससे पाकिस्तान की दावेदारी कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

यूरोपीय कमीशन का कहना है कि बातचीत धीमी है, लेकिन फैसला पूरी तरह निष्पक्ष होगा और सभी पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी। हालांकि सबसे बड़ी बाधा Federation of European Rice Millers (FERM) बन रही है, जो बासमती को PGI देने का पुरजोर विरोध कर रही है। उनका तर्क है कि इससे यूरोप के मिलर्स अपने स्थापित ब्रांड्स के तहत बासमती नहीं बेच पाएंगे। EU ने दोनों देशों से संयुक्त आवेदन का प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन भारत ने इसे राष्ट्रीय संप्रभुता का मामला बताकर ठुकरा दिया।

ट्रेड विशेषज्ञों की राय में EU का यह टैग भारत के लिए बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब तक भारत को 21 देशों में बासमती के लिए GI टैग मिल चुका है, लेकिन यूरोप का दर्जा सबसे प्रभावशाली माना जाता है। कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ चावल का नहीं, बल्कि हमारी कृषि विरासत और वैश्विक व्यापार की रणनीति का है। आने वाले दिनों में फैसला जो भी हो, यह भारतीय बासमती की सुगंध को दुनिया भर में और मजबूत बनाने वाला साबित होगा।

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