
भारत ने अमेरिका के चावल डंपिंग के आरोपो को किया खारिज
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दुनिया में एक दिलचस्प विवाद उभरा है, जो भारत और अमेरिका के बीच चावल निर्यात को लेकर है। मैंने हमेशा से सोचा है कि व्यापार सिर्फ आंकड़ों और शुल्कों का खेल नहीं होता, बल्कि इसमें संस्कृति, गुणवत्ता और राष्ट्रीय गौरव की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। खासकर जब बात बासमती चावल की हो, जो भारत की मिट्टी की खुशबू और किसानों की मेहनत का प्रतीक है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में भारत पर आरोप लगाया कि हम उनके बाजार में चावल को ‘डंपिंग’ करके सस्ते में बेच रहे हैं, यानी वास्तविक कीमत से कम पर। लेकिन भारत ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है, और मेरे विचार में यह फैसला बिलकुल सही है। आखिरकार, हमारा निर्यात ज्यादातर प्रीमियम क्वालिटी का बासमती चावल है, जो सामान्य चावल से कहीं महंगा होता है। चलिए, इस मुद्दे को थोड़ा गहराई से समझते हैं, जैसे कि मैं आपको अपनी डायरी से कोई कहानी सुना रहा हूं।
सबसे पहले, बैकग्राउंड को समझना जरूरी है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्ते हमेशा से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन ने पहले भी कई बार टैरिफ बढ़ाकर भारतीय उत्पादों को निशाना बनाया है। इसी साल अगस्त में, अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर शुल्क बढ़ा दिया, जो 50% तक पहुंच गया। इसमें चावल के अलावा कपड़ा, रसायन और झींगा जैसे उत्पाद शामिल थे। इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा झटका लगा। ट्रम्प ने हाल ही में एक बयान में कहा कि भारत अमेरिकी बाजार में चावल को सस्ते में डाल रहा है, जिससे उनके किसानों को नुकसान हो रहा है। लेकिन क्या यह आरोप सही है? मेरे हिसाब से नहीं, क्योंकि डंपिंग का मतलब होता है किसी उत्पाद को उसके घरेलू बाजार की कीमत से कम पर विदेश में बेचना, ताकि बाजार पर कब्जा किया जा सके। लेकिन बासमती चावल की बात अलग है – यह एक लग्जरी आइटम है, जिसकी कीमत हमेशा ऊंची रहती है।
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भारत सरकार ने इस पर साफ-साफ जवाब दिया है। व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि अमेरिका को होने वाला हमारा चावल निर्यात मुख्य रूप से बासमती का है, जो प्रीमियम सेगमेंट में आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डंपिंग का कोई मामला बनता ही नहीं, क्योंकि हमारा चावल उच्च दामों पर बेचा जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात – फिलहाल अमेरिका ने भारत के खिलाफ कोई एंटी-डंपिंग जांच शुरू नहीं की है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर, यह आरोप बेबुनियाद लगता है। मुझे लगता है कि यह अमेरिकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है, जहां घरेलू किसानों को खुश करने के लिए विदेशी आयात पर आरोप लगाए जाते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय बासमती चावल की मांग अमेरिका में इसलिए है क्योंकि उसकी गुणवत्ता और स्वाद बेजोड़ है। सामान्य गैर-बासमती चावल से इसकी तुलना करना ही गलत है।
अब आंकड़ों की बात करें, जो इस तर्क को मजबूत बनाते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। 2024/25 वित्त वर्ष में, हमने कुल 20.2 मिलियन मीट्रिक टन चावल का निर्यात किया। इसमें से अमेरिका को सिर्फ 3,35,554 टन चावल भेजा गया, जो कुल निर्यात का एक छोटा सा हिस्सा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस मात्रा में से 2,74,213 टन बासमती चावल था। यानी, अमेरिका को जाने वाला ज्यादातर चावल प्रीमियम क्वालिटी का है। बासमती चावल की कीमत सामान्य चावल से दो-तीन गुना ज्यादा होती है। उदाहरण के लिए, जहां सामान्य चावल 500-600 रुपये प्रति क्विंटल बिकता है, वहीं बासमती 1500-2000 रुपये या उससे ज्यादा। ऐसे में, इसे डंपिंग कहना हास्यास्पद है। भारतीय पक्ष का कहना है कि इतनी ऊंची कीमत वाले उत्पाद को डंपिंग की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? यह तर्क बिलकुल ठोस है, और मुझे लगता है कि इससे अमेरिकी आरोपों की हवा निकल जाती है।
इस विवाद के बीच, दोनों देशों के बीच बातचीत भी जारी है। हाल ही में, भारत की एक टीम ने दिल्ली में अमेरिकी उप व्यापार प्रतिनिधि रिक स्विट्जर से मुलाकात की। इस बैठक में न सिर्फ चावल डंपिंग के मुद्दे पर चर्चा हुई, बल्कि द्विपक्षीय व्यापार और प्रस्तावित व्यापार समझौते पर भी बात की गई। भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ही आगे बढ़ना चाहता है। मेरे अनुभव से, ऐसे विवादों में बातचीत ही सबसे अच्छा रास्ता है। अगर अमेरिका जांच शुरू करता भी है, तो भारत के पास मजबूत सबूत हैं – हमारे निर्यात की गुणवत्ता और कीमतें। साथ ही, भारतीय बासमती निर्यातक संघ ने भी इन आरोपों को खारिज किया है और केंद्र सरकार से मजबूत प्रतिक्रिया की मांग की है। सितंबर 2025 से अमेरिका ने 50% टैरिफ लगाया है, जिससे हमारे निर्यात में गिरावट आई है। लेकिन फिर भी, हमारी सप्लाई गुणवत्ता पर आधारित है, न कि किसी डंपिंग नीति पर।
इस मुद्दे को और गहराई से देखें तो यह सिर्फ चावल का नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार की राजनीति का मामला है। अमेरिका में ट्रम्प की वापसी के बाद, ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति फिर से जोर पकड़ रही है। वे आयात पर शुल्क बढ़ाकर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना चाहते हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है। हमारे किसान बासमती चावल उगाने में सालों की मेहनत लगाते हैं – पंजाब और हरियाणा की उपजाऊ भूमि, पारंपरिक तरीके, और निर्यात के लिए क्वालिटी चेक। मैंने खुद एक बार पंजाब के खेतों में जाकर देखा है, जहां किसान बताते हैं कि बासमती की खुशबू और लंबे दाने इसे खास बनाते हैं। अमेरिकी बाजार में इसकी मांग इसलिए है क्योंकि वहां के उपभोक्ता प्रीमियम प्रोडक्ट्स पसंद करते हैं। अगर डंपिंग होता, तो कीमतें कम होतीं, लेकिन रिकॉर्ड्स दिखाते हैं कि भारतीय बासमती हमेशा ऊंचे दामों पर बिकता है।
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इस विवाद के आर्थिक प्रभाव भी कम नहीं हैं। भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण बाजार है, भले ही कुल निर्यात का छोटा हिस्सा हो। अगर टैरिफ और बढ़े, तो निर्यातक प्रभावित होंगे, जो लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि वे भी बासमती निर्यात करते हैं। लेकिन भारत की बाजार हिस्सेदारी मजबूत है, और हमारी गुणवत्ता हमें आगे रखती है। सरकार का स्टैंड सराहनीय है – वे कहते हैं कि हम नियमों का पालन करते हैं और किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। मेरे विचार में, यह विवाद जल्द सुलझ जाएगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौते पर बात चल रही है। भारत ने हमेशा से मुक्त व्यापार की वकालत की है, लेकिन अनुचित आरोपों के खिलाफ खड़ा होना भी जरूरी है।
अंत में, यह कहानी हमें याद दिलाती है कि व्यापार में गुणवत्ता और सच्चाई सबसे ऊपर होती है। भारत का बासमती चावल न सिर्फ एक उत्पाद है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। अमेरिकी आरोपों को खारिज करके, हमने अपनी स्थिति मजबूत की है। उम्मीद है कि बातचीत से यह मुद्दा हल हो जाएगा, और दोनों देश मजबूत रिश्ते बनाएंगे। आखिरकार, अच्छा व्यापार सबके हित में होता है।