
चावल के निर्यात को लेकर क्या मिल रही है लेटेस्ट रिपोर्ट
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश बना हुआ है, लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल 2025 से शुरू) में इसके निर्यात में स्थिरता देखने को मिल रही है। अप्रैल से नवंबर 2025 तक भारत ने लगभग 7.3 अरब डॉलर मूल्य का चावल निर्यात किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले लगभग समान स्तर पर है। वैश्विक बाजार में बढ़ते भंडार और प्रमुख उत्पादक देशों में रिकॉर्ड पैदावार के कारण भारतीय चावल की रफ्तार थोड़ी सुस्त पड़ी है। पिछले साल वैश्विक अस्थिरता, युद्ध के खतरे और अतिरिक्त स्टॉकिंग की वजह से कई देशों ने ज्यादा खरीद की थी, लेकिन इस वर्ष स्थिति सामान्य होने से नई मांग की गति धीमी हो गई है।
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इस स्थिरता के पीछे कई वैश्विक और क्षेत्रीय कारक काम कर रहे हैं। प्रमुख आयातक देशों में स्टॉक भर चुके हैं, जिससे तत्काल खरीद की जरूरत कम हो गई है। थाईलैंड, वियतनाम और पाकिस्तान जैसे प्रतिस्पर्धी देशों में भी अच्छी फसल होने से बाजार में सप्लाई बढ़ी है। नवंबर 2025 में भारतीय चावल निर्यात में सालाना आधार पर करीब 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई, जो बाजार की सुस्ती को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। हालांकि, कुल मिलाकर वर्ष की शुरुआत से अब तक निर्यात मूल्य स्थिर बना हुआ है, जो भारतीय उत्पादकों की मजबूत स्थिति को दिखाता है।
एक बड़ी चुनौती अमेरिका द्वारा भारतीय बासमती चावल पर लगाए गए उच्च टैरिफ रही है। 2025 में अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए, जिससे बासमती की मांग पर असर पड़ा। अमेरिका भारतीय बासमती का महत्वपूर्ण बाजार है, जहां प्रवासी भारतीय समुदाय की वजह से प्रीमियम किस्मों की अच्छी खपत होती है। इन टैरिफों ने कीमतों को प्रभावित किया और कुछ हद तक निर्यात को दबाव में लाया। फिर भी, भारत ने अन्य बाजारों जैसे सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात में अपनी पकड़ मजबूत रखी है।
ईरान का मामला भी भारतीय निर्यातकों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ईरान लंबे समय से भारतीय बासमती का प्रमुख खरीदार रहा है, लेकिन आर्थिक संकट और रियाल की भारी गिरावट ने आयातकों की स्थिति कमजोर कर दी है। भुगतान में देरी और अनिश्चितता के कारण कई सौदे प्रभावित हुए हैं। ऊपर से इजरायल-ईरान तनाव ने शिपिंग रूट्स और बीमा में जोखिम बढ़ा दिया, जिससे शिपमेंट रुक गए या महंगे हो गए। ईरानी सरकार की आयात अनुमति में देरी ने स्थिति को और जटिल बना दिया। इन सबके बावजूद, ईरान अभी भी भारतीय चावल की महत्वपूर्ण मांग रखता है, लेकिन फिलहाल खरीद धीमी है।
उत्पादन के लिहाज से भारत मजबूत स्थिति में है। 2025 में रिकॉर्ड पैदावार के अनुमान हैं, जिससे घरेलू स्टॉक भरपूर हैं और निर्यात के लिए पर्याप्त सप्लाई उपलब्ध है। सरकार ने भी निर्यात प्रतिबंधों को ढीला किया है, जिससे बाजार में भारतीय चावल की उपलब्धता बढ़ी। लेकिन वैश्विक कीमतें नरम रहने से निर्यातक ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष के बाकी हिस्से में मांग में सुधार हो सकता है, खासकर अगर मौसम अनुकूल रहा और नए बाजार खुलें।
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कुल मिलाकर, वित्त वर्ष 2025 में भारतीय चावल निर्यात वैश्विक राजनीतिक उथल-पुथल, मुद्रा संकट, टैरिफ बाधाओं और बदलती मांग पैटर्न के दबाव में स्थिर बना रहा। बाजार में अपेक्षित तेजी नहीं आई, लेकिन भारत की मजबूत उत्पादन क्षमता और विविध बाजारों ने इसे संभाला। मंडी मार्केट मीडिया जैसे विश्लेषकों का कहना है कि आगे चलकर चावल बाजार में नई चमक आ सकती है, खासकर अगर अफ्रीका और एशिया के उभरते बाजारों में मांग बढ़ी। निर्यातक अब नए अवसरों की तलाश में हैं, ताकि स्थिरता को增長 में बदला जा सके। भारतीय चावल की गुणवत्ता और विश्वसनीयता ही इसका सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है।