
क्या आने वाले समय में सरसों तेल का रेट बढ़ सकता है
भारतीय घरों में सरसों का तेल सदियों से खाने का प्रमुख माध्यम रहा है। इसका तीखा स्वाद और स्वास्थ्य लाभ इसे उत्तर भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय बनाते हैं। दिसंबर 2025 में सरसों तेल की कीमतें मंडियों में 14800 से 15500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रही हैं, जबकि रिटेल बाजार में यह 150 से 170 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच रहा है। कुछ राज्यों में पैकेड तेल की कीमत 180-200 रुपये प्रति लीटर तक है। पिछले कुछ महीनों में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से तेजी आई, लेकिन आयातित सस्ते तेलों के कारण दबाव भी बना रहा। अब सवाल यह है कि आने वाले समय में, खासकर 2026 में, सरसों तेल के दाम बढ़ेंगे या स्थिर रहेंगे।
सरसों एक रबी फसल है, जिसकी बुवाई अक्टूबर-नवंबर में होती है और कटाई मार्च-अप्रैल में। 2025-26 सीजन की बुवाई अब तक अच्छी चल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार उत्पादन 125 से 135 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल से बेहतर है। सरकार ने रबी 2026-27 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जो पिछले साल से 250 रुपये अधिक है। यह किसानों को प्रोत्साहन देगा, लेकिन ज्यादा उत्पादन की स्थिति में बाजार भाव MSP से नीचे भी रह सकते हैं। अगर फसल अच्छी हुई तो सप्लाई बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ेगा।
कीमतों को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं। सबसे बड़ा मौसम है। अगर सर्दी में अच्छी ठंड और समय पर बारिश हुई तो फसल शानदार होगी, लेकिन अगर मौसम अनियमित रहा तो उत्पादन घट सकता है और दाम बढ़ सकते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कारक आयातित खाद्य तेल हैं। पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की वैश्विक कीमतें अगर कम रहीं तो सरसों तेल पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। 2025 में इंडोनेशिया और मलेशिया से सस्ता पाम ऑयल आने से घरेलू कीमतें दबाव में रही हैं। तीसरा, घरेलू मांग है। त्योहारों, शादियों और सर्दियों में सरसों तेल की खपत बढ़ती है, लेकिन अगर स्टॉक ज्यादा रहा तो यह मांग भी कीमतों को बहुत ऊपर नहीं ले जा सकेगी।
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2026 के लिए विशेषज्ञों का अनुमान मिश्रित है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ज्यादा बुवाई और अच्छे उत्पादन से कीमतें स्थिर या थोड़ी कम रह सकती हैं। पिछले साल की तरह ओवरसप्लाई की स्थिति बने तो मंडी भाव 6000-6500 रुपये प्रति क्विंटल तक भी आ सकते हैं। हालांकि, कुछ कारक तेजी का समर्थन भी कर सकते हैं। अगर वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ीं, जैसे यूक्रेन-रूस क्षेत्र में सप्लाई बाधित हुई या इंडोनेशिया ने निर्यात प्रतिबंध लगाया, तो सरसों तेल भी महंगा हो सकता है। इसके अलावा, अगर बुवाई क्षेत्र अंततः कम रहा या कीट-पतंगे का हमला हुआ तो उत्पादन प्रभावित होगा और कीमतें ऊपर जा सकती हैं। निर्यात मांग भी अहम है। भारत सरसों तेल का बड़ा उत्पादक है और अगर विदेशी बाजारों में डिमांड बढ़ी तो दामों को सहारा मिलेगा।
वर्तमान में बाजार संतुलित दिख रहा है। दिसंबर 2025 में कुछ मंडियों में कीमतें 7000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंची हैं, जो त्योहारी मांग का असर है। लेकिन जैसे-जैसे नई फसल की आवक शुरू होगी, मार्च 2026 से कीमतों में नरमी आ सकती है। मिलों की खरीद और स्टॉकिस्टों का रुख भी महत्वपूर्ण रहेगा। अगर मिलें आक्रामक खरीद करें तो तेजी आएगी, अन्यथा दबाव बनेगा। कुल मिलाकर, 2026 में सरसों तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ने की संभावना कम दिखती है, क्योंकि उत्पादन अच्छा होने के अनुमान हैं और आयातित तेल सस्ते हैं। फिर भी, मौसम और वैश्विक घटनाएं अनिश्चितता बनाए रखती हैं।
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उपभोक्ताओं के लिए सलाह है कि वे कीमतों पर नजर रखें और जरूरत के अनुसार खरीदें। किसानों को चाहिए कि वे MSP का लाभ उठाएं और बाजार की स्थिति देखकर बिक्री करें। सरसों तेल भारतीय रसोई का अभिन्न अंग है और इसके दाम आम आदमी की थाली को सीधे प्रभावित करते हैं। आने वाला साल स्थिर कीमतों वाला हो सकता है, लेकिन प्रकृति और वैश्विक बाजार कभी भी सरप्राइज दे सकते हैं। अंत में, संतुलित उत्पादन और मांग ही कीमतों को नियंत्रित रखेंगे।