रबी सीजन 2025-26: बुआई रफ्तार में, किसानों के लिए अच्छे संकेत

रबी बुवाई के मामले में पिछले साल के मुकाबले जबरदस्त बढ़त
रबी बुवाई के मामले में पिछले साल के मुकाबले जबरदस्त बढ़त

रबी सीजन 2025-26: बुआई रफ्तार में, किसानों के लिए अच्छे संकेत

रबी सीजन 2025-26 बुआई रफ्तार में, किसानों के लिए अच्छे संकेत : साथियों, मैं लंबे समय से कृषि बाजार और फसलों की प्रगति पर नजर रखता हूं, और इस बार रबी सीजन की शुरुआत देखकर सच में खुशी हो रही है। देश में रबी सीजन की बुआई इस बार उम्मीद से काफी अधिक आगे निकल चुकी है। अगर हम आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो कुल सामान्य रबी रकबा 637.81 लाख हेक्टेयर माना जाता है, जिसके मुकाबले 12 दिसंबर तक 536.76 लाख हेक्टेयर में बुवाई पूरी हो चुकी है। यानी लगभग 85 प्रतिशत क्षेत्र कवर हो गया है। यह आंकड़ा पिछले साल इसी समय के 512.76 लाख हेक्टेयर से करीब 4.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है। मेरे अनुभव से, ऐसी तेज प्रगति का मतलब है कि मौसम ने किसानों का साथ दिया है, और आने वाली फसल से अच्छी पैदावार की उम्मीद की जा सकती है।

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इस बढ़ोतरी में सबसे बड़ा योगदान गेहूं का रहा है। गेहूं का रकबा पिछले साल के 258.48 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस बार 275.66 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, यानी करीब 6.5 प्रतिशत की अच्छी बढ़त। मैंने कई किसानों से बात की है उत्तर भारत में, वे बताते हैं कि इस बार मिट्टी में नमी अच्छी है, जिससे बीज अंकुरण बेहतर हुआ। इसके अलावा, सरकार द्वारा गेहूं का MSP बढ़ाया जाना भी किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है। इस बार मौसम ने भी पूरा साथ दिया – 10 दिसंबर को समाप्त सप्ताह में देशभर में वर्षा सामान्य से लगभग 20 प्रतिशत अधिक रही, जबकि उत्तर-पश्चिव और मध्य भारत में इससे भी ज्यादा बारिश दर्ज की गई। यह अतिरिक्त नमी रबी फसलों के लिए वरदान साबित हो रही है, खासकर उन इलाकों में जहां सिंचाई की सुविधा कम है।

दलहनों की बात करें तो कुल रबी दलहन रकबा 1.5 प्रतिशत बढ़कर 117.11 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसमें प्रमुख दलहन चना का रकबा करीब 4 प्रतिशत बढ़कर 84.91 लाख हेक्टेयर पहुंचा है, हालांकि यह अब भी इसके सामान्य 100.99 लाख हेक्टेयर से कम है। चना किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और अच्छा मुनाफा देता है। मसूर के रकबे में हल्की बढ़त दर्ज की गई, जो प्रोटीन से भरपूर होने की वजह से मांग में हमेशा रहता है। लेकिन मटर, कुल्थी, उड़द और मूंग का रकबा पिछले साल से कम रहा। शायद किसानों ने इनकी जगह अन्य फसलों को तरजीह दी हो, लेकिन कुल दलहन क्षेत्र में बढ़ोतरी सकारात्मक है।

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मोटे अनाजों में भी दिलचस्प बदलाव देखने को मिले। मक्का ने सबको चौंकाया है – इसका रकबा 11.5 प्रतिशत बढ़कर 15.60 लाख हेक्टेयर हो गया। मक्का अब पोल्ट्री और इंडस्ट्री में ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, इसलिए किसान इसे ज्यादा बो रहे हैं। जौ की बुवाई में भी लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो स्वास्थ्य के लिहाज से लोकप्रिय हो रहा है। इसके विपरीत ज्वार और बाजरा के रकबे में गिरावट आई, जबकि रागी में सुधार देखने को मिला। रागी जैसे पौष्टिक अनाजों की बुआई बढ़ना अच्छा संकेत है, क्योंकि सरकार भी श्री अन्न को प्रमोट कर रही है।

तिलहन फसलों में सरसों ने शानदार प्रदर्शन किया। सरसों का रकबा 4 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 84.67 लाख हेक्टेयर हो गया, जो इसके सामान्य स्तर से ऊपर है। सरसों से तेल निकलता है, और घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। दूसरी ओर मूंगफली, तिल और अलसी के रकबे में कमी दर्ज की गई, लेकिन सूरजमुखी और कुसुम की बुवाई में बढ़ोतरी हुई। कुल मिलाकर तिलहन क्षेत्र में संतुलन बना हुआ है।

मैंने खुद कई मंडियों और खेतों का दौरा किया है, और वहां का माहौल उत्साहपूर्ण है। किसान बताते हैं कि इस बार बारिश समय पर और पर्याप्त हुई, जिससे बुआई आसान हो गई। कुल मिलाकर अधिकांश रबी फसलों की बुवाई अंतिम चरण में है, और अगर मौसम इसी तरह मेहरबान रहा तो पैदावार रिकॉर्ड स्तर पर जा सकती है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। लेकिन याद रखें, कृषि में मौसम का खेल रहता है, इसलिए सतर्क रहें और वैज्ञानिक तरीके अपनाएं। आने वाला समय रबी फसलों के लिए उज्ज्वल लग रहा है।

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