
काबुली चने का बाजार: गिरावट का दौर खत्म, अब सुधार की उम्मीद
साथियों, कृषि बाजार की दुनिया में उतार-चढ़ाव तो हमेशा रहते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में काबुली चने ने जो रोलरकोस्टर राइड ली है, वो वाकई में किसानों और व्यापारियों के लिए एक सबक की तरह रहा है। मैं खुद लंबे समय से इस बाजार को फॉलो करता हूं, और मुझे याद है जब दो साल पहले काबुली चने के भाव आसमान छू रहे थे। लेकिन अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। पिछले दो वर्षों से इस बाजार पर लगातार दबाव बना हुआ था, जिसकी वजह से भाव लगातार गिरते चले गए। लेकिन अब, जब भाव निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं, तो आगे और बड़ी गिरावट की गुंजाइश लगभग खत्म होती दिख रही है। यह मेरे जैसे कई लोगों के लिए एक राहत की खबर है, क्योंकि बाजार की यह कमजोरी पूरे कृषि सेक्टर को प्रभावित कर रही थी। आइए, इस पूरी कहानी को थोड़ा विस्तार से समझते हैं, और देखते हैं कि आने वाले दिनों में क्या संभावनाएं हैं।
पिछले दो सीजन की बात करें तो काबुली चने का उत्पादन इतना भारी रहा कि बाजार पूरे साल कमजोर बना रहा। भारी उत्पादन और स्टॉक के फंसने की वजह से हर तरफ दबाव था। मैंने कई किसानों से बात की है, जो बताते हैं कि उनके गोदामों में पुराना स्टॉक पड़ा हुआ था, और नई फसल आने से पहले ही बाजार में सप्लाई का बोझ बढ़ गया। इसकी वजह से भाव लगातार नीचे आते रहे। लेकिन कल की खबर ने सबको चौंका दिया। इंदौर में 42-44 काउंट का चना ₹150 तेज होकर 10400 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंच गया, जबकि डॉलर चना 9700 रुपए पर। राजकोट में डालर चना 9000 रुपए और दिल्ली में चना मैक्सिको 11000 रुपए प्रति क्विंटल तक बोला गया। यह तेजी अचानक नहीं आई; यह उन संकेतों का नतीजा है जो बताते हैं कि बाजार अब बॉटम आउट हो रहा है। मेरे अनुभव से, जब बाजार इतने नीचे पहुंच जाता है, तो छोटी-छोटी तेजियां बड़े ट्रेंड का इशारा देती हैं।
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महाराष्ट्र का काबुली चना चालू सीजन की शुरुआत में ₹71-72 प्रति किलो तक बिक रहा था। उस वक्त किसान खुश थे, क्योंकि यह अच्छा भाव था। लेकिन उसके बाद लगातार गिरावट आती रही। पिछले करीब छह महीनों में भाव लुढ़ककर अब ₹57-58 प्रति किलो (बिना छना हुआ) रह गए हैं, जबकि बढ़िया क्वालिटी का माल अधिकतम ₹60 प्रति किलो तक ही बोला जा रहा है। यह गिरावट इतनी तेज थी कि कई व्यापारियों को घाटा सहना पड़ा। मैंने एक व्यापारी से सुना कि उन्होंने स्टॉक होल्ड किया था उम्मीद में कि भाव ऊपर जाएंगे, लेकिन बाजार ने निराश किया। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भाव नीचे रहने की वजह से निर्यात लगभग शून्य हो गया। पहले काबुली चना मिडिल ईस्ट और यूरोप में अच्छा एक्सपोर्ट होता था, लेकिन अब वैश्विक मंदी और प्रतिस्पर्धा की वजह से यह रुक गया। घरेलू बाजार में भी पिछले छह महीनों से लोकल और दिसावरी मांग कमजोर रही। इसका एक बड़ा कारण मंदी के नीचे भाव और मंडियों में लगातार स्टॉक का दबाव था। कर्नाटक की कई मंडियों में माल का उठाव बेहद कम रहा, और अब तक मंडियों में सप्लाई का दबाव बना हुआ है। मैंने खुद कर्नाटक की कुछ मंडियों का दौरा किया है, और वहां का नजारा देखकर लगा कि स्टॉक इतना ज्यादा है कि ट्रक लाइन में लगे रहते हैं।
लेकिन अब अच्छी खबर यह है कि स्थिति बदल रही है। इस बार कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में काबुली चने की बिजाई कम बताई जा रही है। अकेले कर्नाटक में करीब 32% तक गिरावट का अनुमान है। इसके अलावा, अक्टूबर के अंतिम सप्ताह की बारिश से बोई गई फसल को भी नुकसान पहुंचा है। बारिश ने कई इलाकों में फसल को प्रभावित किया, जिससे पैदावार पर असर पड़ा। पिछले दो वर्षों में काबुली चने का उत्पादन लगभग 30-31 लाख मीट्रिक टन रहा था। नए और पुराने स्टॉक को मिलाकर कुल उपलब्धता करीब 37-38 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी, जिससे पूरे साल बाजार पर दबाव बना रहा। लेकिन अब, घटती बिजाई और फसल नुकसान को देखते हुए, चालू सीजन में उत्पादन घटकर लगभग 21-22 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यह कमी बाजार को संतुलित करने में मदद करेगी। भले ही पुराना स्टॉक अभी भी कुछ मात्रा में मौजूद रहेगा, लेकिन मंडी मार्केट मीडिया का मानना है कि स्टॉक और बिजाई क्षेत्र में आई गिरावट, साथ ही खपत सीजन को देखते हुए, काबुली चने में अब यहां से गिरावट की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी है। मेरे जैसे एक्सपर्ट्स का यही कहना है कि अब हर गिरावट पर खरीदारी करने का मौका बन सकता है। लेकिन याद रखें, व्यापार अपने विवेक से करें – बाजार कभी भी अप्रत्याशित हो सकता है।
काबुली चने में और गिरावट की संभावना खत्म – रिपोर्ट
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। काबुली चना, जिसे हम चिकपीज भी कहते हैं, भारत में एक महत्वपूर्ण दलहन फसल है। यह प्रोटीन से भरपूर होता है और शाकाहारी भोजन में प्रमुख भूमिका निभाता है। पिछले सालों में इसकी मांग बढ़ी थी, लेकिन ओवरप्रोडक्शन ने सब कुछ बदल दिया। मैंने देखा है कि किसान अक्सर अच्छे भाव देखकर ज्यादा बिजाई कर देते हैं, लेकिन जब सप्लाई बढ़ जाती है, तो भाव गिरते हैं। यही हुआ काबुली चने के साथ। 2023-24 सीजन में उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, और स्टॉक बिल्डअप हो गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से सस्ता चना आने से भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ। घरेलू स्तर पर, महंगाई और आर्थिक मंदी ने मांग को कम किया। लोग कम खर्च कर रहे थे, और प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री में भी स्लोडाउन था। कर्नाटक, जो काबुली चने का प्रमुख उत्पादक है, वहां मंडियां जैसे बेल्लारी और गुलबर्गा में स्टॉक का ढेर लगा रहा। व्यापारी बताते हैं कि उठाव न होने से माल खराब होने का डर था।
अब, नई फसल की बात करें। बिजाई क्षेत्र में कमी आई है क्योंकि किसानों ने पिछले सालों के नुकसान से सबक लिया। कर्नाटक में 32% की गिरावट का मतलब है कि हजारों हेक्टेयर जमीन अब अन्य फसलों के लिए इस्तेमाल हो रही है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी यही ट्रेंड है। अक्टूबर की बारिश ने कुछ इलाकों में जड़ें कमजोर कर दीं, जिससे पैदावार 10-15% तक कम हो सकती है। कुल मिलाकर, उत्पादन 21-22 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जो पिछले सालों से काफी कम है। पुराना स्टॉक अभी भी 5-6 लाख टन के आसपास हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे खपत बढ़ेगी, यह स्टॉक कम होगा। खपत सीजन अब शुरू हो रहा है – सर्दियों में चने की मांग बढ़ती है, क्योंकि यह सूप, सलाद और स्नैक्स में इस्तेमाल होता है। त्योहारों का सीजन भी मदद करेगा।
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मंडी मार्केट मीडिया के अनुसार, अब बाजार में स्थिरता आएगी। कल की तेजी जैसे संकेत बताते हैं कि बॉटम बन चुका है। इंदौर, राजकोट और दिल्ली जैसी प्रमुख मंडियों में भाव ऊपर चढ़ने लगे हैं। यह व्यापारियों के लिए मौका है कि गिरावट पर खरीदें और होल्ड करें। लेकिन सावधानी बरतें – मौसम, सरकारी नीतियां और वैश्विक घटनाएं बाजार को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, अगर निर्यात फिर से शुरू होता है, तो भाव और ऊपर जा सकते हैं। मैं सलाह दूंगा कि छोटे व्यापारी रिस्क मैनेजमेंट करें और बड़े प्लेयर्स मार्केट ट्रेंड्स पर नजर रखें। कुल मिलाकर, काबुली चने का बाजार अब रिकवरी मोड में लग रहा है। पिछले दो सालों की कमजोरी ने सबको सिखाया कि बैलेंस जरूरी है। उम्मीद है कि आने वाला सीजन बेहतर होगा। व्यापार अपने विवेक से करें, और बाजार की हर हलचल पर नजर रखें।