2025 के अंत तक कैसे चलेगा मक्का का बाजार

2025 के अंत तक कैसे चलेगा मक्का का बाजार
2025 के अंत तक कैसे चलेगा मक्का का बाजार

2025 के अंत तक कैसे चलेगा मक्का का बाजार

2025 के अंत तक कैसे चलेगा मक्का का बाजार : साथियों, आज मैं आपसे मक्का बाजार की उन गहराइयों में उतरने वाला हूं, जहां कीमतें कभी आसमान छूती नजर आती हैं तो कभी जमीन पर लोटती हुई। पिछले कुछ दिनों में जो तेजी आई है, उसके बावजूद मक्का की कीमतें अभी भी अपने सबसे निचले स्तरों के इर्द-गिर्द ही मंडरा रही हैं, मानो कोई पुराना दोस्त जो कभी ऊंचाइयों पर था लेकिन अब थक-हार कर नीचे बैठ गया हो। मैंने सालों से इस बाजार को करीब से देखा है, और मुझे लगता है कि यह कमजोरी कोई संयोग नहीं, बल्कि घरेलू और वैश्विक स्तर पर उत्पादन की उस भारी-भरकम बाढ़ का नतीजा है, जो हर तरफ से बह रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का के दाम इतने कमजोर पड़े हैं कि लगता है जैसे वे किसी लंबी बीमारी से जूझ रहे हों। पिछले करीब डेढ़ साल से तो वैश्विक कीमतें भारतीय स्तर से भी नीचे रहीं, जिसकी वजह से हमारा निर्यात बिल्कुल ठप सा हो गया। लेकिन अब, घरेलू बाजार में भावों की गिरावट ने एक नई कहानी लिख दी है – भारतीय मक्का की कीमतें वैश्विक स्तर के इतने करीब आ गई हैं कि एक्सपोर्ट पैरिटी बन चुकी है। यानी, अब निर्यात का दरवाजा खुलने लगा है, और निचले स्तरों पर बाजार स्थिरता की सांस ले रहा है। यह वो पल है जब बाजार कह रहा है, “अब और नीचे नहीं गिरूंगा, बल्कि धीरे-धीरे ऊपर चढ़ूंगा।

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चलिए, अब ताजा अपडेट पर नजर डालते हैं, जो मेरे लिए हमेशा बाजार की नब्ज पकड़ने का सबसे अच्छा तरीका रहा है। खरगोन मंडी में मक्का के भाव में ₹50 की तेजी आई है, जो एवरेज मक्का को 1475 रुपए प्रति क्विंटल और सुखी मक्का को 1810 रुपए तक ले गई। यह छोटी सी तेजी भी मुझे उत्साहित करती है, क्योंकि यह संकेत है कि बाजार में कुछ हलचल है। गुलाब बाग में तो भाव 2127 रुपए तक पहुंच गया, जो काफी मजबूत लगता है। दिल्ली में यूपी की मक्का 2200 रुपए और बिहार की 2250 रुपए पर टिकी हुई है, जबकि छिंदवाड़ा में 1750 रुपए और तिरुपति स्टार्च इंदौर पर ₹1800 प्रति क्विंटल का स्तर है।

इन आंकड़ों को देखकर मैं सोचता हूं कि कितनी विविधता है हमारे बाजार में – कहीं सूखी मक्का की चमक है, तो कहीं गीली की चुनौती। लेकिन कुल मिलाकर, ये भाव बताते हैं कि बाजार अब गिरावट के चक्र से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इथेनॉल कंपनियों की मांग में तो अभी भी कोई खास सुधार नहीं दिख रहा, जो थोड़ा निराशाजनक है, क्योंकि इथेनॉल उद्योग हमारी मक्का की बड़ी खपत का स्रोत रहा है।

लेकिन निर्यात की मांग में जो बढ़ोतरी हुई है, वह बाजार को स्थिर रखने में बड़ा रोल निभा रही है। यह मांग ऐसी है जैसे कोई पुरानी लौट आई हो, जो बाजार को गर्माहट दे रही है।

अब बात करते हैं निर्यात की, जो मेरे ख्याल से इस पूरी कहानी का टर्निंग पॉइंट है। भारत ने पहले ही बांग्लादेश को करीब 1 लाख टन मक्का के निर्यात सौदे कर लिए हैं, और यह तो बस शुरुआत है। नई फसल आने से पहले अतिरिक्त 5 लाख टन तक का और निर्यात होने का अनुमान है, जो बाजार को एक मजबूत सहारा दे सकता है। कल्पना कीजिए, हमारे किसानों की मेहनत से उगाई गई मक्का अब सीमाओं के पार जाकर दुनिया को खिलाएगी। लेकिन यहां एक चेतावनी भी है – अगर निर्यात बड़े पैमाने पर नहीं हुआ, तो घरेलू बाजार पर स्टॉक का दबाव इतना बढ़ सकता है कि कीमतें फिर से डगमगा जाएं।

घरेलू आपूर्ति की बात करें तो चालू सीजन में पहले से ही 15-20 लाख टन का कैरी फॉरवर्ड स्टॉक मौजूद है, जो पिछले साल की विरासत है। ऊपर से उत्पादन मांग से 30-50 लाख टन अधिक रहने का अनुमान है, जिससे कुल स्टॉक 50-70 लाख टन तक पहुंच सकता है। यह स्टॉक इतना भारी है कि लगता है जैसे कोई पहाड़ बाजार पर लटक रहा हो। यदि निर्यात ने इसे संभाला नहीं, तो घरेलू कीमतें फिर से नीचे की ओर लुढ़क सकती हैं, और किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मैंने देखा है कि ऐसे समय में स्मार्ट व्यापारी निर्यात के अवसरों पर नजर रखते हैं, क्योंकि यही बाजार को संतुलित रखता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर डालें तो कहानी और भी रोचक हो जाती है। ब्राजील, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मक्का निर्यातक है, वहां 2025 में मक्का निर्यात का अनुमान 10 लाख टन घटाकर 4.10 करोड़ टन कर दिया गया है।

लेकिन 2024 में ब्राजील ने रिकॉर्ड 3.78 करोड़ टन का निर्यात किया था, जो एक बड़ी उपलब्धि थी। दिसंबर 2025 में शिपमेंट 49.90 लाख टन रहने की उम्मीद है, जो सालाना आधार पर करीब 38% ज्यादा है। यह आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक बाजार में ब्राजील की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी कमजोरी भारत के लिए अवसर बन सकती है। अगर ब्राजील का निर्यात कम होता है, तो हमारी मक्का की डिमांड बढ़ सकती है, और कीमतें मजबूत हो सकती हैं।

मैं सोचता हूं कि वैश्विक बाजार की यह गतिशीलता हमारे घरेलू बाजार को सीधे प्रभावित करती है, जैसे कोई दूर का तूफान जो यहां की लहरों को हिला देता हो। भारत में गिरावट के बाद अब रैक वाली कंपनियों की मांग लौटने से निचले रेट से भाव में करीब 150 रुपए की तेजी आई है। मध्य प्रदेश की मंडियों में भाव 1700-1800 रुपए प्रति क्विंटल चल रहे हैं, जो काफी आशाजनक है। यदि बाजार इससे नीचे आता है, तो मेरे हिसाब से यह खरीदारी का सुनहरा अवसर बन सकता है, क्योंकि यहां से उछाल की संभावना ज्यादा है। व्यापारियों को यहां सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि बाजार की यह स्थिरता एक मजबूत बुनियाद बन सकती है।

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कुल मिलाकर, मक्का बाजार में अब गिरावट की उम्मीद बेहद कम मानी जा रही है, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार अभी भी नाजुक दौर से गुजर रहा है। भाव ऊपर जाते ही मुनाफा वसूली का दौर शुरू हो जाता है, जिससे बाजार पर फिर से दबाव बन जाता है। इसलिए बड़ी तेजी की उम्मीद तो नहीं है, लेकिन यहां से बाजार स्थिरता के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है, जैसे कोई धावक जो थकान के बाद फिर से रफ्तार पकड़ रहा हो।

मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि ऐसे बाजारों में धैर्य और विवेक सबसे बड़ा हथियार है। किसान भाईयों को सलाह दूंगा कि स्टॉक को स्मार्ट तरीके से मैनेज करें, और व्यापारियों से कहूंगा कि निर्यात के ट्रेंड पर नजर रखें। यदि वैश्विक उत्पादन में कोई कमी आती है या निर्यात बढ़ता है, तो कीमतें आसमान छू सकती हैं। लेकिन फिलहाल, बाजार की यह स्थिरता एक सकारात्मक संकेत है, जो बताता है कि सबसे बुरा दौर शायद पीछे छूट चुका है। व्यापार अपने विवेक से करें, क्योंकि बाजार कभी भी सरप्राइज दे सकता है।

अब थोड़ा और गहराई में उतरते हैं, क्योंकि मैं मानता हूं कि मक्का बाजार की कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। हमारे देश में मक्का न सिर्फ एक फसल है, बल्कि लाखों किसानों की जीविका का आधार है। पिछले सालों में जब वैश्विक कीमतें नीचे थीं, तो भारत से निर्यात लगभग बंद हो गया था, जिससे घरेलू बाजार में surplus की समस्या बढ़ गई। लेकिन अब, जब कीमतें करीब आ गई हैं, तो यह एक बड़ा मौका है। बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की मांग हमारी मक्का के लिए हमेशा फायदेमंद रही है, और 1 लाख टन का सौदा तो बस एक शुरुआत है।

अनुमानित 5 लाख टन अतिरिक्त निर्यात से बाजार में नई ऊर्जा आएगी। घरेलू स्तर पर, कैरी स्टॉक और अधिक उत्पादन का दबाव तो है, लेकिन अगर सरकार निर्यात को बढ़ावा देती है, तो यह समस्या हल हो सकती है। ब्राजील की स्थिति को देखें, जहां निर्यात अनुमान घटा है, लेकिन उनका रिकॉर्ड उत्पादन अभी भी वैश्विक बाजार को प्रभावित कर रहा है। दिसंबर में 38% की बढ़ोतरी वाली शिपमेंट से पता चलता है कि वे अभी भी मजबूत हैं, लेकिन अगर मौसम या अन्य कारक प्रभावित करते हैं, तो भारत को फायदा होगा।

मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों की मंडियां अब तेजी दिखा रही हैं, जो मुझे लगता है कि इथेनॉल मांग के सुधार से और मजबूत हो सकती है। फिलहाल इथेनॉल कंपनियां थोड़ी सुस्त हैं, लेकिन अगर पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं या सरकारी नीतियां बदलती हैं, तो मांग में उछाल आ सकता है। बाजार में 150 रुपए की तेजी छोटी नहीं है; यह संकेत है कि खरीदार लौट रहे हैं। यदि भाव 1700 के नीचे जाते हैं, तो मैं खुद खरीदारी की सलाह दूंगा, क्योंकि यहां से रिकवरी की संभावना ज्यादा है।

ऑल ओवर, बाजार अब स्थिर हो रहा है, और बड़ी गिरावट की आशंका कम है। लेकिन मुनाफा वसूली से सावधान रहें, क्योंकि यह बाजार को अस्थिर कर सकती है। धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला बाजार लंबे समय में ज्यादा फायदेमंद होता है। व्यापार करें, लेकिन सोच-समझकर, क्योंकि बाजार की दुनिया अनिश्चितताओं से भरी है।

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