मक्का में तेजी क्यों नहीं आ रही? जानिए असली वजह

मंगलवार को मक्का बाजार में हल्की स्थिरता जरूर देखने को मिली, लेकिन बाजार के भीतर जो दबाव बना हुआ है, वह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। घरेलू मांग फिलहाल कमजोर बनी हुई है और खरीदारों की सक्रियता भी सीमित है। यही वजह है कि भाव ऊपर टिके तो हैं, पर उनमें मजबूती का आत्मविश्वास नजर नहीं आ रहा। व्यापारी वर्ग का मानना है कि जब तक मांग में ठोस सुधार नहीं आता, तब तक बाजार में बड़ी तेजी की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।
अगर अलग-अलग मंडियों के भाव पर नजर डालें तो गुलाब बाग में मक्का ₹1800 प्रति क्विंटल पर रहा। छिंदवाड़ा में भाव ₹1720 तक बोले गए। इंदौर के तिरुपति स्टार्च प्लांट में ₹1715 प्रति क्विंटल का स्तर बना रहा, जबकि सांगली के स्टार्च प्लांट में ₹1830 तक के सौदे हुए। जयपुर और पुणे में भाव ₹1850 प्रति क्विंटल के आसपास टिके रहे, वहीं नासिक में ₹1800 प्रति क्विंटल के स्तर पर व्यापार हुआ। मुंबई पोर्ट पर एक्सपोर्ट रेट ₹1875 प्रति क्विंटल तक बोले गए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मांग कमजोर रहने के कारण निर्यात गतिविधि सीमित रही। कुल मिलाकर बाजार ₹1700 से ₹1875 प्रति क्विंटल के दायरे में घूमता नजर आ रहा है।
हालांकि ऊपर से देखने पर स्थिरता दिख रही है, लेकिन अंदरूनी रुझान नरमी का है। सप्लाई बढ़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। रबी फसल की संभावित आवक को देखते हुए व्यापारी सतर्क हैं। मार्च डिलीवरी के सौदे स्पॉट रेट से ₹20 से ₹30 प्रति क्विंटल कम पर हो रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि बाजार आगे चलकर कुछ दबाव की आशंका पहले से ही मान रहा है।
उत्तराखंड में करीब 25 रैक ₹1820 से ₹1870 प्रति क्विंटल के बीच ट्रेड हुए। इसके अलावा 15 रैक ₹1800 प्रति क्विंटल पर मिड-अप्रैल से अर्ली-मई डिलीवरी के लिए बुक किए गए। अगर इन सौदों में लॉजिस्टिक्स और रैक लागत को जोड़ें, जो लगभग ₹150 से ₹200 प्रति क्विंटल बैठती है, तो अप्रैल-मई में गुलाबबाग के स्पॉट भाव ₹1600 से ₹1650 प्रति क्विंटल तक आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्पॉट और फॉरवर्ड रेट के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। यह संकेत देता है कि बाजार ऊंचे स्तर पर टिके रहने के लिए तैयार नहीं है। एक्सपोर्ट पैरिटी की कमी, पोल्ट्री और फीड सेक्टर की कमजोर मांग तथा स्टॉकिस्टों की सतर्कता भी दबाव बढ़ा रही है। इस समय बड़े व्यापारी ज्यादा माल रोकने के बजाय हल्का स्टॉक रखना ही बेहतर समझ रहे हैं।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील का असर भी मक्का बाजार पर नजर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ने और वैश्विक मांग सुस्त रहने से भारतीय निर्यातकों को मनचाहा समर्थन नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में घरेलू बाजार पर ही ज्यादा निर्भरता बनी हुई है। लेकिन जब घरेलू मांग भी मजबूत नहीं है, तो भावों में तेजी टिक पाना मुश्किल हो जाता है।
फिर भी एक सकारात्मक पहलू यह है कि मौजूदा भाव पहले ही काफी निचले स्तर पर माने जा रहे हैं। इसलिए बड़ी गिरावट की संभावना भी फिलहाल कम दिखती है। बाजार में गिरावट सीमित रह सकती है, जब तक कि कोई अचानक बड़ा नकारात्मक कारक सामने न आ जाए।
कुल मिलाकर मक्का बाजार इस समय संतुलन की स्थिति में दिखाई दे रहा है, जहां ऊपर की ओर मजबूती के लिए मांग का सहारा चाहिए और नीचे की ओर गिरावट के लिए सप्लाई का दबाव काम कर रहा है। आने वाले एक-दो महीनों में बाजार की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि घरेलू खपत में कितना सुधार आता है और निर्यात के मोर्चे पर कोई बड़ा सौदा होता है या नहीं।
व्यापारियों और किसानों के लिए सलाह यही है कि वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लें। जल्दबाजी में बड़े सौदे करने से बचें और बाजार के संकेतों पर नजर बनाए रखें। फिलहाल बाजार में स्थिरता जरूर है, लेकिन अंदरूनी माहौल नरमी का है। ऐसे में सावधानी ही सबसे बेहतर रणनीति मानी जा सकती है।