डीएपी नहीं मिल रही? ये रामबाण मिश्रण अपनाओ – विशेषज्ञ बोले: डीएपी से 10 गुना बेहतर, बंपर फसल गारंटी!

रबी का मौसम आते ही भारत के खेतों में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। उत्तर से दक्षिण तक, किसान गेहूं, सरसों, चना और अन्य फसलों की बुवाई में जुट जाते हैं। इस समय ‘बेसल डोज’ यानी आधार खाद के रूप में डीएपी (डायमोनियम फॉस्फेट) की मांग आसमान छूती है। लेकिन बाजार में इसकी भारी कमी और कालाबाजारी की वजह से किसान अक्सर हताश हो जाते हैं। ट्रक लोडर से लेकर गोदामों तक, डीएपी की तलाश में घंटों बर्बाद होते हैं, और कभी-कभी तो महंगे दामों पर भी नहीं मिलती। ऐसे में, क्या कोई ऐसा तरीका है जो इस समस्या को जड़ से खत्म कर दे? हां, कृषि वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी फॉर्मूला तैयार किया है, जो न सिर्फ डीएपी की कमी को पूरा करता है, बल्कि फसलों को 10 गुना ज्यादा पोषण और ताकत देता है। यह फॉर्मूला पारंपरिक तरीकों से अलग है, जो मिट्टी की सेहत को ध्यान में रखते हुए लंबे समय तक लाभ देता है। आइए, इसकी गहराई में उतरें और समझें कि कैसे आप अपनी खेती को स्मार्ट और लाभकारी बना सकते हैं।

सबसे पहले, डीएपी की हकीकत को समझना जरूरी है। डीएपी एक लोकप्रिय खाद है, लेकिन इसके बारे में कई मिथक हैं। एक 50 किलोग्राम के बैग में सिर्फ 23 किलोग्राम फॉस्फोरस (46 प्रतिशत) और 9 किलोग्राम नाइट्रोजन (18 प्रतिशत) होता है। बाकी हिस्सा फिलर मटेरियल से भरा होता है। समस्या यह है कि डीएपी का फॉस्फोरस पूरी तरह पानी में घुलनशील नहीं होता। मिट्टी में डालने के बाद, इसका बड़ा हिस्सा जड़ों तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि यह कैल्शियम या अन्य तत्वों से बंध जाता है। परिणामस्वरूप, फसल को अपेक्षित पोषण नहीं मिलता, और किसान को बार-बार अतिरिक्त खाद डालनी पड़ती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की गिरती उर्वरता के दौर में, डीएपी जैसे पुराने विकल्प अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इसलिए, अब समय है अधिक प्रभावी और घुलनशील विकल्पों की ओर रुख करने का। ये विकल्प न केवल किफायती हैं, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल भी, क्योंकि ये मिट्टी में कम अवशेष छोड़ते हैं और फसल की पैदावार को 20-30 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं।

अब बात करते हैं डीएपी के सबसे मजबूत विकल्प की – ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी)। अगर डीएपी न मिले, तो टीएसपी को अपना ‘ट्रम्प कार्ड’ मानें। टीएसपी में भी 46 प्रतिशत फॉस्फोरस होता है, लेकिन इसकी असली ताकत इसकी 92 प्रतिशत से ज्यादा पानी में घुलनशीलता है। मतलब, हर दाना सीधे जड़ों तक पहुंचता है, बिना बर्बाद हुए। वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हुआ है कि टीएसपी डीएपी की तुलना में फॉस्फोरस का अवशोषण 2-3 गुना बेहतर करता है, खासकर रबी फसलों जैसे गेहूं और सरसों में। लेकिन टीएसपी को अकेले इस्तेमाल करने से बेहतर है एक संतुलित मिश्रण बनाना। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि एक बैग टीएसपी (50 किलो) में 20 किलो यूरिया, 10 किलो बेंटोनाइट सल्फर और 20-25 किलो पोटाश मिलाएं। यह फॉर्मूला फसल को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाशियम और सल्फर का संपूर्ण पैकेज देता है। उदाहरण के लिए, सरसों की फसल में यह मिश्रण तेल की मात्रा को 15 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है, क्योंकि सल्फर तिलहन फसलों के लिए जरूरी है। गेहूं में यह जड़ों को मजबूत बनाता है, जिससे सूखा सहन करने की क्षमता बढ़ती है। पंजाब और हरियाणा के किसानों ने इस फॉर्मूले को अपनाकर अपनी पैदावार में उल्लेखनीय सुधार देखा है। याद रखें, बुवाई के समय इस मिश्रण को समान रूप से फैलाएं, ताकि हर पौधे को बराबर लाभ मिले।

कम बजट वाले किसानों के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) एक वरदान है। डीएपी की कमी को पूरा करने के लिए, एक एकड़ में एसएसपी के तीन बैग (कुल 150 किलो) पर्याप्त हैं। एसएसपी में 16-20 प्रतिशत फॉस्फोरस होता है, लेकिन इसमें सल्फर (12-14 प्रतिशत) और कैल्शियम (18-21 प्रतिशत) भी मुफ्त मिलता है – ये तत्व डीएपी में बिल्कुल नहीं होते। कैल्शियम मिट्टी की अम्लता को नियंत्रित करता है, जबकि सल्फर प्रोटीन संश्लेषण में मदद करता है, जिससे फसल की गुणवत्ता बढ़ती है। यदि आप एनपीके (12:32:16) का उपयोग कर रहे हैं, तो यह और भी बेहतर साबित होता है। एनपीके में पहले से ही नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाशियम का संतुलित अनुपात होता है, इसलिए अलग से यूरिया या पोटाश डालने की जरूरत नहीं। बस, इसमें थोड़ा सल्फर मिलाएं, और आपकी फसल की चमक और मजबूती कई गुना हो जाएगी। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे सूखे इलाकों में एसएसपी-एनपीके का कॉम्बिनेशन ने किसानों को पानी की बचत और बेहतर उपज दी है। एक अध्ययन के मुताबिक, एसएसपी का नियमित उपयोग मिट्टी में जैविक कार्बन को बढ़ाता है, जो लंबे समय में खेती को टिकाऊ बनाता है।

इन खादों के अलावा, मिट्टी की सेहत पर फोकस करना उतना ही महत्वपूर्ण है। रबी सीजन में कई इलाकों में मिट्टी सख्त या खारी होती है, जो जड़ों के विकास को रोकती है। यहां जिप्सम का प्रयोग रामबाण है। बुवाई से 10-15 दिन पहले 200-300 किलो जिप्सम प्रति एकड़ डालें – यह मिट्टी को भुरभुरा बनाता है, हवा और पानी का संचार बढ़ाता है। जिप्सम में कैल्शियम और सल्फर होता है, जो खारी पानी की समस्या को कम करता है। सरसों जैसी तिलहनी फसलों में सल्फर तेल की मात्रा और गुणवत्ता को बढ़ाता है, जबकि गेहूं में यह अनाज की प्रोटीन सामग्री को बेहतर बनाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिप्सम के साथ जैविक खाद जैसे वर्मीकंपोस्ट मिलाने से माइक्रोबायल एक्टिविटी बढ़ती है, जो पोषक तत्वों को उपलब्ध कराती है। इसके अलावा, फसल चक्रण को अपनाएं – रबी के बाद खरीफ में दालें बोएं, ताकि मिट्टी में नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से बढ़े।

इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान न केवल डीएपी की किल्लत से मुक्त हो सकते हैं, बल्कि अपनी खेती को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं। लागत कम होगी, पैदावार ज्यादा, और मिट्टी स्वस्थ रहेगी। सरकार की योजनाओं जैसे पीएम किसान सम्मान निधि या सब्सिडी का लाभ उठाकर इन खादों को खरीदें। याद रखें, खेती अब सिर्फ मेहनत नहीं, स्मार्ट प्लानिंग का खेल है। इन फॉर्मूलों को आजमाएं, और देखें कैसे आपकी फसलें नई ऊंचाइयों को छूती हैं।

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