दालों के आयात को लेकर आई नई अपडेट 33% घटा आयात

दालों के आयात को लेकर आई नई अपडेट 33% घटा आयात
दालों के आयात को लेकर आई नई अपडेट 33% घटा आयात

दालों के आयात को लेकर आई नई अपडेट 33% घटा आयात

भारत में दालों की आयात निर्भरता अब घटने लगी है

भारत में लंबे समय से दालों की कमी एक बड़ी समस्या रही है, जिसके कारण हमें विदेशों से भारी मात्रा में आयात करना पड़ता था। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में दालों का आयात काफी कम होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस साल आयात पिछले साल के मुकाबले लगभग 45 प्रतिशत तक गिर सकता है। जहां पिछले वर्ष 2024-25 में दालों का आयात रिकॉर्ड 7.34 मिलियन टन तक पहुंच गया था, वहीं इस बार यह आंकड़ा सिर्फ 4 मिलियन टन के आसपास रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इस सकारात्मक बदलाव के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा तो घरेलू उत्पादन में मजबूती आना है। अच्छी बारिश और किसानों का बढ़ता उत्साह इसके लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा, पहले से उपलब्ध पर्याप्त स्टॉक और सरकार की आत्मनिर्भरता वाली नीतियां भी बड़ा रोल अदा कर रही हैं। वित्त वर्ष की शुरुआत से ही यह संकेत मिलने लगे थे। अप्रैल से अक्टूबर 2025 तक दालों का आयात 33 प्रतिशत कम होकर 2.37 मिलियन टन रह गया, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 3.54 मिलियन टन था। नवंबर और दिसंबर में करीब 0.5 मिलियन टन आयात होने का अनुमान है, जिससे पूरे साल का कुल आयात सीमित रह जाएगा।

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न सिर्फ मात्रा में कमी आई है, बल्कि आयात पर खर्च होने वाला पैसा भी काफी घट गया है। पहले सात महीनों में आयात बिल 2.83 अरब डॉलर से गिरकर 1.56 अरब डॉलर पर आ गया। वैश्विक बाजार में दालों का उत्पादन बढ़ने और भारत की मांग कम होने से अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 30-40 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। इससे उपभोक्ताओं को भी राहत मिल रही है, क्योंकि बाजार में दालें सस्ती हो रही हैं।

अगर अलग-अलग दालों की बात करें तो तस्वीर थोड़ी मिश्रित है। अरहर (तुअर) का आयात 22 प्रतिशत कम होकर 0.81 मिलियन टन रह गया, मसूर का 37 प्रतिशत घटकर 0.5 मिलियन टन हो गया। वहीं उड़द का आयात 27 प्रतिशत बढ़कर 0.64 मिलियन टन पहुंचा। लेकिन कुल मिलाकर ट्रेंड सकारात्मक है। रबी सीजन में अच्छी बारिश के कारण चना, मसूर और मूंग की पैदावार बढ़ने की उम्मीद है। दालों की बुवाई का क्षेत्रफल पहले ही 11.71 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच चुका है, जो एक अच्छा संकेत है। सरकार के पास करीब 2 मिलियन टन का बफर स्टॉक भी मौजूद है, जो किसी भी कमी की स्थिति में काम आएगा।

पिछले वर्ष 2024-25 में दालों का उत्पादन अनुमानित 25.68 मिलियन टन रहा था। इस साल इसे 27 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य है। लेकिन सरकार की नजर लंबे समय पर है। 11,440 करोड़ रुपये की लागत वाले ‘दाल आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत 2030-31 तक उत्पादन को 35 मिलियन टन तक पहुंचाने की योजना है। इस मिशन में बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक, किसानों को प्रोत्साहन और खरीद की गारंटी जैसे कदम शामिल हैं। इससे न सिर्फ आयात बंद होगा, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ेगी और देश पोषण सुरक्षा के मामले में मजबूत बनेगा।

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यह बदलाव आसान नहीं था। सालों से दालों की कीमतें ऊंची रहती थीं, क्योंकि उत्पादन मांग के मुकाबले कम पड़ता था। लेकिन अब सरकार की नीतियां, जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद और बुवाई क्षेत्र बढ़ाना, रंग ला रही हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो जल्द ही भारत दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा। यह न सिर्फ अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है, बल्कि आम लोगों की थाली में सस्ती और पौष्टिक दाल उपलब्ध कराने में भी मदद करेगा। उम्मीद है कि आने वाले सालों में यह सपना हकीकत बनेगा।

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